आज फिर लिख रही हूं
शब्दों को दर्पण बना
अपना मन देख रही हूं
अंदर के तूफ़ान को
शब्दों का बंधन दे रही हूं
आज फिर मैं,लिख रही हूं

मन में आज कुछ तरल सा है
और कुछ अटल सा है
कुछ प्रेम की शीतलता से भरा सा है
कहीं कुछ ज्वाला है,कुछ गर्म सा है
भावनाओं को उनकी पहचान दे रही हूं
आज फिर कुछ लिख रही हूं

लिखना है आज मुझे चांदनी से नहाई रात को
बिरहन के हृदय के जज़्बात को
लिखना है आंखों की बरसात को
पिता की गोद को तरसते बचपन को
और लिखना है उस रक्षक के बारे में
जो सीमा पे अडा खड़ा है
जैसे कि कोई फ़ौलाद हो
उस साहसी मां बाप की गाथा लिखनी है
जन्म दिया है जिसने ऐसी औलाद को
सभी वीरों को सलामी दे रही हूं
आज फिर मैं कुछ लिख रही हूं
✍️निरूपा कुमारी
स्वरचित मौलिक रचना

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