कविता जो ह्रदय के पटल पर
जन्म लेती है
कभी खुशियों के रंग में रंगी
तो कभी दुख के कांटों में जन्मीं
कभी चांद की चांदनी देख इतराती
तो कभी झील सी नीली
आंखों में खो जाती
कभी आगाध प्रेम की मिशाल बनीं
कभी मीरा की भक्ति में डूबी
कभी रहीम रसखान के
दोहों मे लिपटी
कभी विद्यापति के गीतों में
कभी बिरहन की बिरहा में
कभी नैनन के अंसुवन में
कभी भूखे की भूख में
तो कभी किसी के
जिस्मों के चिथड़ों में
कभी राजनीति पर किया प्रहार
तो कभी किसी के जीत की
फूलों का हार
कविता हर जगह रची गई
चाहे मृत्यु की शैया हो
चाहे जन्म की किलकारी
कवि की कल्पना की है ये फूलवारी
जहाँ हर रंग के हैं फूल खिले हैं
अनवरत चलती रहे कवि की कल्पना
और बनती रहे कविता
✍🏼✍🏼 @ सविता ‘सुमन’
सहरसा (बिहार)

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