भूल कर दुनिया खुद से मुलाकात करते हैं।
आज फिर खुद से खुद की ही बात करते हैं।

खो गए थे हम कहीं जमाने की आबोहवा में,
रह गए कुछ अनसुलझे वो सवालात करते हैं।

क्यों बढ़ रही बेचैनियां इस कदर इस दिल की,
जो कुछ भी हुआ आज हम तहकीकात करते हैं।

चुपके से ही सही शायद दिल कह दे कुछ हमसे,
आईने के सामने खड़े रहे तैयार हालात करते हैं।

बहुत देख ली अब अंधेरी रातें जिंदगी की हमने,
जला उम्मीदों के दीये आज रोशन रात करते हैं।

महक उठे गम ए दुनिया में फिर गुलशन हमारा,
थाम कर जज्बात अपने प्यार की बरसात करते हैं।

छोड़ दें पीछे ‘कला’ हुआ अब तलक जो ज़िंदगी में,
आने वाले कल के लिए आज नई शुरुआत करते हैं।

कला भारद्वाज
शिमला हिमाचल प्रदेश

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