तोड़ के पिंजरा उड़ जाएगी,
सोनचिरैया उस दिन
आत्मविश्वास और स्वाभिमान के,
पर पाएगी जिस दिन।
स्वच्छंदता और स्वतंत्रता का,
जब अर्थ समझ आएगा
फिर कोई सय्याद ना उसको,
कैद में रख पाएगा।
मात्र जरूरत है उसको,
स्वयं को जानने-समझने की
अपनी क्षमताएं पहचानने और
अपने हुनर को परखने की।
ये कोमल और पुलकित पंख
उसके, जब उड़ान भर पाएंगे
मीलों की दूरी अथक बिना रुके,
वेग से तय कर आएंगे।
फिर सोने का हो पिंजरा चाहे,
या मखमली हो घास
ठुकराकर स्वतंत्र हवा में,
स्वतंत्र होकर लेगी सोनचिरैया श्वास।
वह अनंत, असीम आकाश
अब उसकी निज संपत्ति होगी,
स्वतंत्र हुई जो सोनचिरैया
फिर न कभी सय्याद की होगी।
स्वरचित – रुचिका राणा

By admin

Leave a Reply

Your email address will not be published.